IIT मद्रास का बड़ा धमाका: ई-कचरे से धातु निकालने के लिए विकसित की ‘ग्रीन’ तकनीक

G-INews, KANPUR: वैश्विक सर्कुलर इकोनॉमी को एक नई दिशा देते हुए, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) के शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste) से मूल्यवान धातुओं को निकालने का एक अनूठा और पर्यावरण के अनुकूल तरीका विकसित किया है।

​प्रतिष्ठित ‘जर्नल ऑफ सस्टेनेबल मेटलर्जी’ में प्रकाशित यह अध्ययन पारंपरिक और खतरनाक रीसाइक्लिंग विधियों के अंत की शुरुआत माना जा रहा है। इसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) से तांबा (Copper) और लोहा (Iron) निकालने के लिए बायोडिग्रेडेबल ‘डीप यूटेक्टिक सॉल्वेंट्स’ (DES) का उपयोग किया गया है।

खतरनाक रसायनों के युग का अंत

​दशकों से रीसाइक्लिंग उद्योग पायरोमेटालर्जी (भस्मीकरण) और हाइड्रोमेटालर्जी (एसिड लीचिंग) पर निर्भर रहा है। हालांकि ये तरीके प्रभावी हैं, लेकिन ये हवा में जहरीली गैसें छोड़ते हैं और भारी मात्रा में खतरनाक तरल अपशिष्ट (वेस्ट) पैदा करते हैं।

​IIT मद्रास की टीम—जिसका नेतृत्व प्रो. रंजित बाउरी, प्रो. एस. पुष्पवनम और पीएचडी स्कॉलर सुश्री सिनु कुरियन ने किया—ने इन कठोर रसायनों को ‘ग्रीन’ विकल्पों से बदल दिया है। उनकी प्रक्रिया में प्राकृतिक यौगिकों से बने सॉल्वैंट्स का उपयोग किया जाता है जो बायोडिग्रेडेबल और गैर-विषाक्त हैं।

​”यह ग्रीन रिकवरी प्रक्रिया कुंवारी धातु खनन (virgin metal mining) की मांग को कम करते हुए प्रदूषण को काफी कम कर सकती है,” प्रो. रंजित बाउरी ने कहा। “यह भारत की स्थिरता और नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं के साथ पूरी तरह मेल खाता है।”

नैनोटेक्नोलॉजी का जादू: कचरे से ‘नैनो’ खजाना

​इस शोध का सबसे नवीन पहलू कॉपर नैनोकणों (Copper Nanoparticles) का सीधा संश्लेषण है। यह प्रक्रिया केवल धातु को वापस नहीं निकालती, बल्कि निकाले गए तांबे को उच्च मूल्य वाले नैनोकणों में बदल देती है। इनका उपयोग कई उन्नत क्षेत्रों में होता है:

  • ​फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए कंडक्टिव इंक।
  • ​चिकित्सा उपकरणों के लिए रोगाणुरोधी कोटिंग।
  • ​रासायनिक निर्माण के लिए औद्योगिक उत्प्रेरक (Catalysts)।

भारत की ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ को मिलेगा बढ़ावा

​भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-कचरा उत्पादक है। औपचारिक और सुरक्षित चैनलों के माध्यम से रीसाइक्लिंग के बहुत कम विकल्पों के बीच, यह नवाचार “अर्बन माइनिंग” (शहरी खनन) के लिए एक स्केलेबल समाधान प्रदान करता है।

​हाइड्रोजन पेरोक्साइड (H_2O_2) का उपयोग माइल्ड ऑक्सीडेंट के रूप में करने से यह सुनिश्चित होता है कि इस प्रक्रिया के उप-उत्पाद केवल पानी और ऑक्सीजन हैं, जो इसे अब तक विकसित सबसे स्वच्छ रिकवरी प्रणालियों में से एक बनाता है।

आगे की राह

​प्रयोगशाला में सफल परीक्षण के बाद, शोधकर्ता अब इसे औद्योगिक स्तर पर ले जाने की योजना बना रहे हैं। IIT मद्रास तकनीकी हस्तांतरण और पायलट-स्केल कार्यान्वयन के लिए रीसाइक्लिंग उद्योगों के साथ सहयोग की संभावनाएं तलाश रहा है।

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