आईआईटी कानपुर में बढ़ती आत्महत्याओं के खिलाफ छात्रों ने खोला मोर्चा; प्रशासन से जवाबदेही और सुधारों की मांग

​ G-INews, KANPUR : देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) में पिछले दो वर्षों के भीतर हुई नौ आत्महत्याओं ने कैंपस में भय और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। छात्रों ने अब सोशल मीडिया के माध्यम से प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक दबाव को लेकर ठोस सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की है।​छात्रों का तर्क है कि पारदर्शी रिपोर्टिंग के अभाव में कैंपस में अफवाहों और गलत सूचनाओं का बाजार गर्म है, जिसे रोकने के लिए प्रशासन को आत्महत्याओं की विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।​

पीएचडी छात्रों का निशाना: ‘डीएमसी’ मार्गदर्शन नहीं, दबाव का केंद्र​संस्थान के पीएचडी छात्रों ने डॉक्टोरल मॉनिटरिंग कमेटी (DMC) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। छात्रों का कहना है कि यह कमेटी अब शोध में मदद करने के बजाय छात्रों पर मानसिक दबाव बनाने का जरिया बन गई है।

​छात्रों की प्रमुख मांगें:​प्रोफेसरों का चयन: डीएमसी के पैनल में शामिल प्रोफेसरों का चयन छात्र की सहमति से होना चाहिए।​

गाइड की शक्ति पर अंकुश: डीएमसी को यह अधिकार मिले कि वह जरूरत पड़ने पर गाइड के अनुचित निर्णयों को पलट सके।​

ग्रेडिंग में पारदर्शिता: थीसिस में दिए गए ग्रेड का स्पष्ट और लिखित कारण छात्रों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

​काउंसलिंग सेवाओं पर सवाल: “सिर्फ नाम बदलने से मदद नहीं मिलती”​दिसंबर 2025 में संस्थान ने ‘इंस्टीट्यूट काउंसलिंग सर्विस’ (ICS) का नाम बदलकर ‘मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र’ (CMHW) कर दिया था। हालांकि, छात्रों का कहना है कि धरातल पर कोई बदलाव महसूस नहीं हो रहा है।​

सुधार के लिए छात्रों के सुझाव:​एक्सटर्नल ऑडिट: सीएमएचडब्ल्यू (CMHW) की सेवाओं का किसी बाहरी एजेंसी से ऑडिट कराया जाए।​

काउंसलर की पहुंच: प्रत्येक हॉस्टल में काउंसलरों की साप्ताहिक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और मनोचिकित्सकों की संख्या बढ़ाई जाए।​

नीतिगत बदलाव: गंभीर पारिवारिक या चिकित्सकीय संकट का सामना कर रहे छात्रों के लिए HRA (हाउस रेंट अलाउंस) नीति में ढील दी जाए ताकि वे सुरक्षित वातावरण में रह सकें।​

प्रशासनिक जवाबदेही और ‘बैकग्राउंड चेक’ की मांग​

छात्रों ने प्रशासन के उन अधिकारियों पर भी उंगली उठाई है जिनके खिलाफ पहले से ही गंभीर शिकायतें रही हैं। मांग की गई है कि ऐसे अधिकारियों को छात्र-संपर्क (Student-facing) वाले पदों से तुरंत हटाया जाए।​इसके अलावा, छात्रों ने फैकल्टी मेंबर्स के लिए मनोवैज्ञानिक और पृष्ठभूमि जांच (Background Check) की मांग की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रोफेसर छात्रों के प्रति संवेदनशील हैं। हॉस्टलों में सहायता संसाधनों के पोस्टर लगाने और हर सेमेस्टर में शिकायत निवारण तंत्र की जानकारी साझा करने का भी सुझाव दिया गया है।​छात्रों का पक्ष: “हम सिर्फ सुविधाएं नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और पारदर्शी शैक्षणिक वातावरण चाहते हैं जहाँ कोई छात्र खुद को अकेला और असहाय महसूस न करे।”​

अगला कदम: संस्थान प्रशासन की ओर से अब तक इन मांगों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। देखना होगा कि क्या प्रशासन इन मांगों को स्वीकार कर कैंपस में बढ़ रहे इस मानसिक स्वास्थ्य संकट को रोकने में सफल होता है या नहीं।​

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