खेल से भी ज्यादा असरदार है मेडिटेशन: IIT कानपुर की रिसर्च में खुलासा, जानें कैसे ‘अल्फा वेव्स’ बदलती हैं आपका दिमाग

IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने स्पोर्ट्स पर्सन और मेडिटेशन करने वालों के ब्रेन सिग्नलों (EEG) की तुलना कर खोजे चौंकाने वाले तथ्य।


तनाव के बीच ‘रिलैक्स्ड’ ब्रेन एक्टिविटी पर हो रहा है बड़ा अध्ययन; 85 लोगों पर किए गए परीक्षण में सामने आईं नई बातें

G-INews, KANPUR : क्या आप जानते हैं कि जब आप पूरी तरह शांत, रिलैक्स्ड या ध्यान की मुद्रा में होते हैं, तो आपका दिमाग एक विशेष प्रकार की तरंगें छोड़ता है? इन्हें ‘अल्फा वेव्स’ (Alpha Waves) कहा जाता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के शोधकर्ता इसी दिमागी रहस्य को सुलझाने में जुटे हैं कि आखिर तनाव हमारी निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making), वर्किंग मेमोरी और नफ़े-नुकसान के आकलन को कैसे प्रभावित करता है।
​इस शोध के बीच एक बेहद चौंकाने वाली और नई बात सामने आई है। आमतौर पर माना जाता है कि खेलकूद (Sports) से मानसिक स्वास्थ्य सबसे बेहतर होता है, लेकिन IIT कानपुर की इस ताजा स्टडी में पाया गया है कि स्पोर्ट्स के मुकाबले मेडिटेशन (ध्यान) करने से मस्तिष्क कहीं ज्यादा शांत, एकाग्र और संतुलित रहता है।

Associate Prof. Tushar sandhan

EEG तकनीक और दिमागी तरंगों का विश्लेषण

​शोधकर्ताओं की टीम EEG (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम) जैसी गैर-आक्रामक (Non-invasive) तकनीकों का उपयोग कर रही है। इसके जरिए वे तनाव के विभिन्न स्तरों का एक ऑटोमेटेड मॉडल तैयार कर रहे हैं। इस मॉडल में ‘कंट्रोल खोने का अहसास’, ‘बेबसी’ और ‘घबराहट’ जैसे कारकों को शामिल किया जा रहा है, जो मानसिक विकारों के मानक मैनुअल (DSM-5) में दर्ज हैं।

  • क्या हैं अल्फा वेव्स? लगभग 100 साल पहले खोजी गई ये तरंगें तब सक्रिय होती हैं जब दिमाग शांत, रिलैक्स्ड या ध्यान (Meditation) की मुद्रा में होता है, आमतौर पर आँखें बंद होने पर।
  • बाइन्यूरल बीट्स का असर: अक्टूबर 2025 में ‘IEEE एक्सप्लोर’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, तनावग्रस्त व्यक्ति को 8-12 हर्ट्ज़ की अल्फा फ्रीक्वेंसी वाली ‘बाइन्यूरल बीट्स’ (दोनों कानों में अलग-अलग फ्रीक्वेंसी वाली आवाजें) सुनाने पर अल्फा वेव्स में भारी बढ़ोतरी देखी गई, जिससे लोगों का तनाव कम हुआ।

​फ्रंटल अल्फा एसिमेट्री (Frontal Alpha Asymmetry) पर शोध

​प्रोफेसर संधान के नेतृत्व में टीम EEG के जरिए मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ (Frontal Lobe) में अल्फा तरंगों की गतिविधि की जांच कर रही है। यह हिस्सा निर्णय लेने, खुद को समझने और सही-गलत का फैसला करने के लिए जिम्मेदार होता है।

​इसके साथ ही, टीम ‘फ्रंटल अल्फा एसिमेट्री’ नाम के एक बायोमार्कर का भी अध्ययन कर रही है। इसमें मस्तिष्क के एक हिस्से (Hemisphere) में दूसरे हिस्से की तुलना में अधिक अल्फा तरंगें रिकॉर्ड होती हैं। डिप्रेशन (अवसाद) जैसी न्यूरोलॉजिकल स्थितियों में यह असंतुलन काफी ज्यादा देखा जाता है। प्रोफेसर संधान के मुताबिक, डिप्रेशन का संबंध बाएं फ्रंटल हिस्से में अधिक अल्फा पावर से देखा गया है, जो किसी लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा (Approach Motivation) को कम कर देता है।


​📊 रिसर्च का एक्सक्लूसिव डेटा: स्पोर्ट्स बनाम मेडिटेशन


​IIT कानपुर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर तुषार संधान की देखरेख में चल रहे इस अध्ययन में कुल 85 लोगों (सब्जेक्ट्स) को शामिल किया गया। इस रिसर्च की सबसे खास बात इसकी तुलनात्मक स्टडी है, जिसमें तीन अलग-अलग कैटेगरी के लोगों के ब्रेन सिग्नल्स का विश्लेषण किया गया:
पहली कैटेगरी: वे लोग जो नियमित रूप से मेडिटेशन (ध्यान) करते हैं।
​दूसरी कैटेगरी: वे युवा और छात्र जो स्पोर्ट्स (खेलकूद) में सक्रिय रहते हैं।
​तीसरी कैटेगरी: वे लोग जिन्होंने कभी मेडिटेशन या विशेष फिजिकल एक्टिविटी नहीं की।

आईआईटी लैब में प्रयोग के दौरान प्रोफेसर तुषार संधान


क्या निकला नतीजा? > प्रो. तुषार संधान के अनुसार, जब इन तीनों श्रेणियों के ईईजी (EEG) सिग्नल्स की तुलना की गई, तो पाया गया कि स्पोर्ट्स खेलने वालों की तुलना में मेडिटेशन करने वाले लोगों के मस्तिष्क पर इसके कहीं अधिक सकारात्मक और गहरे प्रभाव (Benefits) थे। —


​🧘‍♂️ काम को बेहतर बनाता है ‘काम’ (Calm) माइंड


​अक्सर लोग कहते हैं कि मेडिटेशन से परफॉर्मेंस सुधरती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने अब इसका ईईजी (EEG) सिग्नल्स के जरिए तकनीकी प्रमाण ढूंढ निकाला है।
​विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग नियमित ध्यान लगाते हैं, उनके दिमाग से एक पर्टिकुलर टाइप की वेव्स (अल्फा वेव्स) जनरली जनरेट होती हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि ध्यान लगाने वाला व्यक्ति आम दिनों में सामान्य काम करते समय या दूसरों से बातचीत करते समय भी बेहद ‘काम एंड क्वाइट पोज़िशन’ (Calm and Quiet State) में रहता है। उनका स्वभाव बहुत शांत और केयरफुल हो जाता है। जब दिमाग इतना शांत होकर सोचता है, तो तनाव के क्षणों में भी व्यक्ति बेहद सटीक निर्णय लेता है और उसकी कार्यक्षमता कई गुना बढ़ जाती है।


​💻 कैसे हो रहा है अध्ययन? आधुनिक गैजेट्स और AI का मेल
​प्रोफेसर संधान के नेतृत्व में टीम मस्तिष्क के ‘फ्रंटल लोब’ (Frontal Lobe) में अल्फा तरंगों की गतिविधि की जांच कर रही है—मस्तिष्क का यही हिस्सा सही-गलत का फैसला करने के लिए जिम्मेदार होता है। इसके लिए टीम कई आधुनिक और स्वदेशी उपकरणों का उपयोग कर रही है:
कस्टम 3D प्रिंटेड हेडबैंड: लचीले सिलिकॉन इलेक्ट्रोड से बना हेडबैंड जो मस्तिष्क के ईईजी (EEG) सिग्नल्स को कैप्चर करता है।
स्मार्टवॉच: दिल की धड़कनों और कार्डियक एक्टिविटी पर नजर रखने के लिए।
DAAFNet एल्गोरिदम: प्रोफेसर संधान की टीम द्वारा विकसित यह विशेष AI एल्गोरिदम भावनाओं को पहचानने और तनाव के स्तर का विश्लेषण करने के लिए ईईजी डेटा को प्रोसेस करता है।
बाइन्यूरल बीट्स थेरेपी: ‘IEEE एक्सप्लोर’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, तनावग्रस्त व्यक्ति को दोनों कानों में 8-12 हर्ट्ज़ की अलग-अलग फ्रीक्वेंसी वाली ‘बाइन्यूरल बीट्स’ सुनाने पर अल्फा वेव्स में भारी बढ़ोतरी देखी गई, जिससे तनाव तुरंत कम हुआ।


​⚙️ चुनौतियाँ: स्वभाव (Trait) और मानसिक स्थिति (State) का अंतर


​इस शोध की व्यावहारिक चुनौतियों पर आईआईटी गांधीनगर के कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइंसेज विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर वैभव त्रिपाठी कहते हैं कि आँखें बंद करते ही अल्फा वेव्स ईईजी पर साफ दिखने लगती हैं, लेकिन इंसान का मूड और ऊर्जा का स्तर पूरे दिन बदलता रहता है। सुबह व्यक्ति ऊर्जावान हो सकता है, जबकि शाम तक वह तनाव में आ सकता है।
​चूंकि अल्फा वेव्स व्यक्ति के मूल स्वभाव (Trait) और उसकी तात्कालिक मानसिक स्थिति (State) दोनों से प्रभावित होती हैं, इसलिए वैज्ञानिक अब एक ऐसा पूरी तरह से ‘वस्तुनिष्ठ’ (Objective) पैमाना या ऑटोमेटेड मॉडल तैयार कर रहे हैं, जो दिनभर के उतार-चढ़ाव के बीच भी तनाव का बिल्कुल सटीक सटीक नतीजा दे सके।


​आगे की राह: IIT कानपुर की टीम इस रिसर्च को और आगे बढ़ा रही है तथा इसमें अधिक से अधिक छात्रों और विषयों को शामिल किया जा रहा है। यह तकनीक भविष्य में ‘ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस’ (BCI) और मेडिकल रिहैबिलिटेशन (चिकित्सीय पुनर्वास) के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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