G-INEWS, NEW DELHI : देश में JEE Main मेन और NEET UG जैसी प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं को लेकर केंद्र सरकार बड़े बदलाव की तैयारी में है। इसका मकसद छात्रों की कोचिंग संस्थानों पर बढ़ती निर्भरता कम करना और डमी स्कूलों की समस्या से निजात पाना है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने स्कूल शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों का प्रस्ताव रखा है, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बोझ स्कूल व्यवस्था के भीतर ही संतुलित किया जा सके।
उच्च शिक्षा विभाग के सचिव विनीत जोशी की अध्यक्षता में गठित इस समिति का गठन 17 जून 2025 को किया गया था। समिति को स्कूल शिक्षा की कमियों, प्रवेश परीक्षाओं की निष्पक्षता व प्रभावशीलता, डमी स्कूलों के बढ़ते चलन और कोचिंग कल्चर के छात्रों पर पड़ रहे प्रभावों की समीक्षा का दायित्व सौंपा गया था। इस पैनल में सीबीएसई अध्यक्ष राहुल सिंह, एनटीए के महानिदेशक राजेश लखानी, और IIT Kanpur, IIT Madras NIT Trichy आईआईटी कानपुर, आईआईटी मद्रास व एनआईटी तिरुचिरापल्ली के प्रोफेसर शामिल हैं। समिति की बैठकें 26 अगस्त और 15 नवंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित शास्त्री भवन में हुई थीं।
कोचिंग कल्चर की जड़ स्कूल सिस्टम में खामियां
बैठकों के दौरान समिति ने माना कि कोचिंग संस्कृति स्कूल व्यवस्था की कमियों के कारण पनपी है। सदस्यों का कहना था कि यदि स्कूलों को मजबूत किया जाए तो निजी कोचिंग पर निर्भरता स्वाभाविक रूप से घट सकती है। कोचिंग संस्थानों के बढ़ते प्रभाव से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक समानता और स्कूलों की भूमिका पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
स्कूल सिलेबस और प्रवेश परीक्षा पैटर्न में बड़ा अंतरसमिति की जांच में सामने आया कि स्कूल पाठ्यक्रम और जेईई मेन-नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के पैटर्न में बड़ा अंतर है। कक्षा 10 से 11 में संक्रमण छात्रों के लिए अत्यधिक तनावपूर्ण साबित हो रहा है।
सीबीएसई का एनालिटिकल और कॉन्सेप्चुअल एप्रोच है, जबकि प्रवेश परीक्षाओं का MCQ आधारित ऑब्जेक्टिव फॉर्मेट, दोनों के बीच तालमेल की कमी ही कोचिंग निर्भरता की मुख्य वजह मानी गई है। यही अंतर डमी स्कूलों को भी बढ़ावा दे रहा है।
स्कूलों में जेईई-नीट स्तर के प्रशिक्षित शिक्षक नहीं
समिति ने पाया कि अधिकांश स्कूलों में शिक्षक बोर्ड परीक्षा से आगे की तैयारी कराने के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं। इसके विपरीत, कोचिंग संस्थान इंजीनियरों और मेडिकल ग्रेजुएट्स जैसे विषय विशेषज्ञों को नियुक्त करते हैं, जो टार्गेटेड तैयारी कराते हैं।स्कूलों में नियमित टेस्ट, परफॉर्मेंस एनालिटिक्स और विशेष अध्ययन सामग्री जैसे इकोसिस्टम का अभाव भी छात्रों को कोचिंग की ओर धकेल रहा है।
कम उम्र में कोचिंग जॉइन करने पर चिंता
समिति ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि अब छात्र बहुत कम उम्र में कोचिंग संस्थानों से जुड़ रहे हैं, जिससे उन पर शैक्षणिक और मानसिक दबाव बढ़ रहा है।
समिति के प्रमुख सुझाव
NCERT, NTA, CBSE और अन्य बोर्डों के सहयोग से स्कूल सिलेबस और प्रतियोगी परीक्षाओं में समन्वय के लिए एक नोडल एजेंसी बनाई जाए।
NTA पिछले तीन वर्षों के शिफ्ट-वार प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी और कैंडिडेट-लेवल डेटा IIT कानपुर को उपलब्ध कराए, ताकि परीक्षाओं की वैधता और विश्वसनीयता का आकलन हो सके।
साइकोमेट्रिक विशेषज्ञों से प्रश्नों की कठिनाई और छात्रों में अंतर करने की क्षमता का विश्लेषण कराया जाए।
स्कूल शिक्षा विभाग और CBSE कोचिंग में छात्रों की भागीदारी पर सर्वे कराएं।
CBSE स्कूलों में प्रॉब्लम-सॉल्विंग और मेंटरिंग क्लासेस शुरू करे।
छात्रों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कोचिंग क्लास को रोजाना 2–3 घंटे तक सीमित करने पर विचार।
कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन, फैकल्टी योग्यता और वास्तविक सफलता दर का अनिवार्य खुलासा।
प्रवेश परीक्षाएं साल में एक से अधिक बार कराई जाएं।कॉलेज दाखिले में बोर्ड परीक्षा अंकों को अधिक वेटेज दिया जाए।
कक्षा 11 से ही प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू करने की संभावना पर विचार।
कक्षा 8 से करियर काउंसलिंग की शुरुआत।स्कूल पाठ्यक्रम को हाई-ऑर्डर थिंकिंग, समस्या-समाधान और समयबद्ध मूल्यांकन के अनुरूप फिर से डिजाइन किया जाए।
रटने की प्रवृत्ति खत्म करने के लिए MCQ और वर्णनात्मक प्रश्नों का हाइब्रिड मॉडल।
प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस मॉडल के तहत उद्योग व अकादमिक विशेषज्ञों को विजिटिंग फैकल्टी बनाया जाए।
एक राष्ट्रीय एप्टीट्यूड और करियर गाइडेंस पोर्टल विकसित किया जाए।






