​IIT कानपुर में छात्रों की मौतों पर केंद्र सख्त : शिक्षा मंत्रालय की उच्चस्तरीय जांच समिति 15 दिन में देगी रिपोर्ट ​

G-INews, KANPUR : 22 जनवरी 2026 : आईआईटी कानपुर में पिछले कुछ समय से लगातार हो रही छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं को केंद्र सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया है। हाल ही में पीएचडी स्कॉलर रामस्वरूप की दुखद मृत्यु के बाद, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा और परामर्श व्यवस्थाओं की समीक्षा के लिए एक तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है।​

​शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार, इस समिति का नेतृत्व प्रो. अनिल डी. सहस्त्रबुद्धे (चेयरपर्सन, एनईटीएफ) करेंगे। समिति के अन्य सदस्यों में :डॉ. जितेंद्र नागपाल: वरिष्ठ मनोचिकित्सक, मूलचंद अस्पताल।​संयुक्त सचिव (उच्च शिक्षा): शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार शामिल हैं।

जांच के मुख्य बिंदु: क्यों उठाया यह कदम?

​मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि छात्रों का मानसिक और भावनात्मक कल्याण उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। समिति निम्नलिखित पहलुओं पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी: ​दिशानिर्देशों का अनुपालन: क्या आईआईटी कानपुर जुलाई 2023 में जारी ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य’ संबंधी सरकारी गाइडलाइन्स का पालन कर रहा है?

​व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता: संस्थान में मौजूद काउंसलिंग (परामर्श) सेवाएं, शिकायत निवारण तंत्र और छात्र सहायता प्रणालियां कितनी सक्रिय और प्रभावी हैं?​

पिछली घटनाओं का अध्ययन: हाल के वर्षों में हुई छात्र मौतों की परिस्थितियों का गहन विश्लेषण कर सिस्टम की कमियों को पहचान करना.

15 दिनों में देनी होगी रिपोर्ट

​समिति को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। वे आईआईटी कानपुर के प्रशासन, छात्रों, शिक्षकों और पीड़ित परिवारों से सीधा संवाद कर सकते हैं। साथ ही, संस्थान से किसी भी प्रकार के दस्तावेज या रिकॉर्ड मांगने का अधिकार भी समिति के पास होगा। मंत्रालय ने इस मामले में 15 दिनों की समय सीमा तय की है, जिसके बाद रिपोर्ट के आधार पर भविष्य के कड़े कदम उठाए जाएंगे।​

संस्थान का पक्ष और छात्रों की मांग

​उधर, आईआईटी कानपुर ने भी अपनी ओर से मानसिक स्वास्थ्य केंद्र के विस्तार और नए मनोवैज्ञानिकों की नियुक्ति जैसे कदमों की घोषणा की है और दावा किया है कि जांच समिति को वह पूरा सहयोग करेगी ।हालांकि, छात्रों और विशेषज्ञों का मानना है कि केवल ढांचागत बदलाव काफी नहीं हैं, बल्कि एक संवेदनशील और जवाबदेह अकादमिक माहौल बनाना समय की मांग है।​

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