G-INews, KANPUR : डिजिटल युग में जहां स्मार्टफोन और स्क्रीन की लत किशोरों की पढ़ाई को प्रभावित कर रही है, वहीं छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU), कानपुर के शिक्षा विभाग ने एक बड़ा समाधान खोज निकाला है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के नेतृत्व और अकादमिक नवाचार की मुहिम के तहत विभाग ने एक अनोखा ‘डिजिटल डाइट मॉडल’ (DDM) तैयार किया है, जो छात्र-छात्राओं की बिगड़ती अध्ययन आदतों को सुधारने में गेम-चेंजर साबित हो रहा है।

CSJMU शिक्षा विभाग के डॉ. विमल सिंह के मार्गदर्शन में शोधार्थी महिमा त्रिपाठी द्वारा शोध कार्य पूरा किया गया है। उनके इस शोध का विषय “Efficacy Testing of Digital Diet Model on Study Habits of Adolescent Children” है।
कैसे आया ‘डिजिटल डाइट मॉडल’ का आइडिया?
आज के समय में डिजिटल गैजेट्स बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में किशोरों में बढ़ती स्क्रीन-निर्भरता, समय प्रबंधन (Time Management) की कमी और पढ़ाई में घटती एकाग्रता जैसी गंभीर चुनौतियां सामने आ रही थीं। इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे व्यावहारिक मॉडल की जरूरत महसूस की गई, जो तकनीक के नुकसान से बचाकर उसके संतुलित उपयोग को बढ़ावा दे सके। इसी सोच से ‘डिजिटल डाइट मॉडल’ (DDM) का जन्म हुआ।
12 छात्रों पर हुआ ‘क्वाजी एक्सपेरिमेंट’
इस वैज्ञानिक अध्ययन के लिए 10 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों को लक्षित किया गया था। कुल 100 विद्यार्थियों में से उद्देश्यपूर्ण नमूना चयन (Purposive Sampling) पद्धति के जरिए 12 विद्यार्थियों को शॉर्टलिस्ट किया गया।इन छात्रों को दो अलग-अलग ग्रुप्स में बांटा गया:
प्रायोगिक समूह (Experimental Group): 6 छात्र, जिन्हें डिजिटल डाइट मॉडल के तहत रखा गया।
नियंत्रित समूह (Controlled Group): 6 छात्र, जो सामान्य रूटीन में रहे।
इसके बाद ‘अर्ध-प्रायोगिक अनुसंधान अभिकल्प’ (Quasi Experimental Design) के माध्यम से दोनों समूहों के व्यवहार और अध्ययन आदतों का बारीकी से विश्लेषण किया गया।
शोध के चौंकाने वाले और उत्साहवर्धक निष्कर्ष
इस रिसर्च के परिणाम बेहद सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाले रहे हैं। जिन विद्यार्थियों ने डिजिटल डाइट मॉडल (DDM) का पालन किया, उनके भीतर कई बेहतरीन बदलाव देखे गए:
अध्ययन में अनुशासन: छात्र अपनी पढ़ाई को लेकर पहले से अधिक अनुशासित नजर आए।
बेहतर समय प्रबंधन: सोशल मीडिया और रील्स में वक्त गंवाने के बजाय छात्र पढ़ाई को सही समय देने लगे।
फोकस और एकाग्रता: छात्रों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया।
डिजिटल वेल-बीइंग:
तकनीक का सीमित और सही इस्तेमाल करने से उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता (Academic Quality) में भारी बढ़ोतरी हुई।
भविष्य की शिक्षा के लिए मील का पत्थर
इस शोध के परिणाम साफ संकेत देते हैं कि आज के दौर में ‘डिजिटल वेल-बीइंग’ महज एक किताबी शब्द नहीं, बल्कि समय की मांग है। डॉ. विमल सिंह के मार्गदर्शन में तैयार यह नवाचारी मॉडल भविष्य में स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए एक गाइडबुक का काम कर सकता है। CSJMU परिवार ने इस शोध को शिक्षा जगत के लिए एक प्रेरणादायक और व्यावहारिक कदम बताया है।
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