G-INews, KANPUR : क्या गाड़ियों का बढ़ता हुआ आकार और भारीपन (Oversized Vehicles) हमारी सड़कों को पैदल चलने वालों के लिए “डेथ ट्रैप” बना रहा है? आईआईटी कानपुर में आयोजित “ICSM-PMS 2026” अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जुटे दुनिया भर के विशेषज्ञों ने इसी ‘मोबिसिटी’ (Mobesity) नाम के नए वैश्विक संकट पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे शहरों में भारी SUVs और बड़ी गाड़ियों का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पैदल यात्रियों के जीवित बचने की संभावना कम होती जा रही है।

भारत-ऑस्ट्रेलिया शोध सहयोग (SPARC प्रोजेक्ट)यह सम्मेलन सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी कानपुर द्वारा आयोजित किया गया था। यह भारत सरकार की SPARC (Scheme for Promotion of Academic and Research Collaboration) योजना के तहत वित्तपोषित एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना का हिस्सा है। इसके प्रमुख भागीदार आईआईटी कानपुर और यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया रहे। इसका मुख्य फोकस स्मार्ट शहरों में पैदल यात्री व्यवहार का विश्लेषण और तकनीकी सुरक्षा तंत्र रहा।

क्या है ‘मोबिसिटी’ (Mobesity)?
जिस तरह इंसानों में मोटापा (Obesity) स्वास्थ्य के लिए खतरा है, उसी तरह वाहनों का बढ़ता वजन और आकार ‘Mobesity’ (Mobility + Obesity) कहलाता है।सम्मेलन के मुख्य वक्ता, यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के प्रो. मिलाद हघानी ने अपने व्याख्यान “The global rise of oversized vehicles (‘mobesity’)” में बताया कि सड़कों पर बढ़ती विशालकाय गाड़ियाँ व्यवस्थित रूप से पैदल यात्री सुरक्षा को खत्म कर रही हैं।विशेषज्ञों द्वारा उजागर किए गए ‘मोबिसिटी’ के 3 बड़े खतरेब्लाइंड स्पॉट्स और विजिबिलिटी: भारी और ऊंचे बोनट वाली गाड़ियों के कारण ड्राइवरों को सामने से गुजरने वाले बच्चे या छोटे कद के पैदल यात्री दिखाई नहीं देते।

घातक प्रभाव (Impact Severity): एक छोटी कार की तुलना में भारी SUV से होने वाली टक्कर में पैदल यात्री की मृत्यु होने की संभावना कई गुना अधिक होती है।
बुनियादी ढांचे पर दबाव: शहरी सड़कें और पार्किंग स्थल इन विशाल गाड़ियों के हिसाब से नहीं बने हैं, जिससे पैदल यात्रियों के चलने की जगह कम होती जा रही है।
डेटा और तकनीक से ‘मोबिसिटी’ का मुकाबलाआईआईटी कानपुर के डीन (R&D) प्रो. तरुण गुप्ता और सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विशेषज्ञों ने जोर दिया कि इस समस्या से निपटने के लिए अब पुराने तरीकों से काम नहीं चलेगा।

सम्मेलन में निम्नलिखित तकनीक-आधारित समाधानों पर चर्चा हुई:
LiDAR और AI सेंसिंग: विशाल वाहनों के ब्लाइंड स्पॉट्स को कवर करने के लिए स्मार्ट सेंसिंग का उपयोग।
डिजिटल ट्विन्स: शहरों का वर्चुअल मॉडल बनाकर यह देखना कि बड़ी गाड़ियाँ पैदल चलने वालों के लिए कहाँ सबसे ज्यादा खतरनाक हैं।
मशीन लर्निंग: ‘नियर-मिस’ (दुर्घटना से बाल-बाल बचना) स्थितियों की पहचान कर भविष्य के जोखिमों को रोकना।
जियोस्पेशियल विश्लेषण: भौगोलिक सूचना प्रणालियों (GIS) के जरिए दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान।
नियामक हस्तक्षेप: विशेषज्ञों ने सरकार से मांग की कि वाहनों के वजन और आकार को लेकर सख्त नीतियां बनाई जाएं।

वैश्विक सहयोग: आईआईटी कानपुर और मेलबर्न की पहलयह सम्मेलन SPARC-वित्तपोषित शोध परियोजना का हिस्सा था। आईआईटी कानपुर के प्रो. सलिल गोयल ने बताया कि यह परियोजना विशेष रूप से मिश्रित यातायात (Mixed Traffic) वाले भारतीय शहरों में पैदल यात्री व्यवहार को समझने के लिए है, जहाँ ‘मोबिसिटी’ का खतरा पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं अधिक है।
”हम अब अनुभव-आधारित यातायात प्रबंधन पर निर्भर नहीं रह सकते। हमें डेटा-आधारित नीतियों की जरूरत है जो पैदल यात्री को केंद्र में रखें, न कि भारी गाड़ियों को।” — प्रो. तरुण गुप्ता, डीन (R&D), आईआईटी कानपुर
निष्कर्ष: सुरक्षा पहले, स्वैग बाद में सम्मेलन का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि शहरी विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें और बड़ी गाड़ियाँ नहीं, बल्कि एक सुरक्षित पैदल यात्री मार्ग भी है। विशेषज्ञों का स्पष्ट संदेश था—अगर ‘मोबिसिटी’ पर जल्द लगाम नहीं लगाई गई, तो सड़कों पर पैदल चलना एक जानलेवा जोखिम बना रहेगा।






