राष्ट्रीय शर्करा संस्थान का कमाल , अब सल्फर के बजाय पेड़ की छाल से साफ होगी चीनी

GIN, Kanpur : राष्ट्रीय शर्करा संस्थान कानपुर ने पेड़ की छाल का प्रयोग करते हुए चीनी उत्पादन की ऐसी प्रक्रिया विकसित की है जिसमें चीनी को डबल सल्फिटेशन प्रक्रिया से नहीं गुजारना होगा। सल्फर का प्रयोग पूरी तरह से खत्म करने से चीनी मिलों के जल उत्सर्जन में प्रदूषण को कम किया जा सकेगा और लोगों को प्रयोग के लिए सल्फर मुक्त चीनी मिल सकेगी। इस प्रक्रिया में चूने का प्रयोग भी आधा हो गया है। चीनी मिलों की उत्पादन लागत घटाने वाली यह तकनीक मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और चीनी मिलों तीनों के लिए लाभकारी है। तकनीक का सफल प्रयोग अयोध्या के रौजागांव की चीनी मिल में 6000 मीट्रिक टन गन्ने से चीनी बनाने में किया गया है। संस्थान निदेशक प्रो. सीमा परोहा ने बताया कि तकनीक के वैश्विक पेंटेंट के लिए आवेदन किया गया है।L9

संस्थान निदेशक प्रो. परोहा के नेतृत्व में शुगर टेक्नोलाजी के सहायक आचार्य महेंद्र कुमार यादव ने तकनीक के विकास पर पिछले छह महीने के दौरान डेढ़ हजार से ज्यादा प्रयोगशाला परीक्षण किए हैं। प्रो. परोहा ने बताया कि पूरी दुनिया में अभी चीनी को तैयार करने की जो चार प्रमुख विधियां हैं उनमें रसायनों का प्रयोग किया जाता है। भारत की 80 प्रतिशत चीनी मिलें डबल सल्फिटेशन से गन्ने के रस को प्लांटेशन व्हाइट शुगर और कच्ची चीनी या रिफाइंड चीनी तैयार करती हैं। पहली बार संस्थान में पर्यावरण अनुकूल नई विधि पर काम हुआ है। यह शोध कार्य रायटन प्रा.लि. के साथ हुए एमओयू के तहत पूरा किया गया है।

पेड़ की छाल का हुआ प्रयोग

उन्होंने बताया कि टैनिन उद्योग में अर्जेंंटीना में पाए जाने वाले वृक्ष क्चेब्राचो की छाल से तैयार चूर्ण का प्रयोग किया जाता है। रायटन कंपनी ने इसे संस्थान को उपलब्ध कराया है। इसका प्रयोग गन्ने के रस को शुद्ध करने के लिए किया गया है। इसकी विशेष प्रक्रिया है जिसका विकास संस्थान में हुआ है। प्रयोगशाला में सफलता मिलने के बाद रौजागांव की चीनी मिल की प्रयोगशाला में भी परीक्षण किया गया और सबसे अंत में मिल में तैयार हो रही चीनी में भी इसका प्रयोग किया गया। 16 नवंबर से 18 नवंबर 2025 के दौरान हुए व्यावसायिक उत्पादन प्रयोग के परिणाम अत्यंत चौंकाने वाले रहे हैं। डबल सल्टिफेशन में प्रयोग होने वाले सल्फर का प्रयोग पूरी तरह से खत्म हो गया और सफेद चूने का प्रयोग भी 50 प्रतिशत घट गया है। इसके साथ ही गन्ने के रस की शुद्धता भी चार गुणा से ज्यादा बढ़ गई है। इससे परिष्कृत चीनी तैयार करने की प्रक्रिया भी आसान हुई और चीनी मिलों के जल उत्सर्जन में प्रदूषण भी घट गया है। उत्पादित चीनी का रंग लगभग 70 से 80 % तक सुधरा, जो गुणवत्ता में एक उल्लेखनीय सुधार है।अनुसंधानकर्ता महेंद्र यादव ने बताया कि अर्जेंटीना के वृक्ष की छाल में मौजूद प्राकृतिक को कोएगुलेंट ( एक ऐसा पदार्थ जो किसी तरल पदार्थ को जमा देता है, गाढ़ा करता है या थक्का बनाता है। इसका उपयोग पानी और अपशिष्ट जल उपचार में किया जाता है, जहाँ यह छोटे कणों को एक साथ लाने में मदद करता है ताकि उन्हें आसानी से हटाया जा सके।) को भारत में पाये जाने वाले विभिन्न वृक्षों, जैसे बबूल, जामुन, अर्जुन, बहेड़ा, आम की छाल, नीम की छाल, यूकेलिप्टस से भी प्राप्त किया जा सकता है। इन वृक्षों की छाल का प्रयोग भी एनएसआइ के प्रारंभिक शोध में किया गया और परिणाम आशा के अनुकूल हैं। इन छालों का प्रयोग अर्जेंंटीना के वृक्ष की छाल के विकल्प में किया जा सकता है।प्रो. परोहा ने बताया कि पर्यावरण समर्थित इस तकनीक से राष्ट्रीय सतत विकास लक्ष्यों तथा हरित उद्योग के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में आसानी होगी। चीनी मिल में हुए परीक्षण में तकनीकी सहायक अनुराग वर्मा और संस्थान की शोधार्थी, शालिनी वर्मा भी शामिल रही हैं।

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