G-INews ,KANPUR : मधुमेह (Diabetes) के रोगियों में किडनी की समस्या एक गंभीर चुनौती है, लेकिन अब छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के एक नए शोध ने इस दिशा में बड़ी उम्मीद जगाई है। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस एंड बायोटेक्नोलॉजी की शोधार्थी शताक्षी चतुर्वेदी ने एक्सोसोम (Exosomes) आधारित एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे किडनी इंजरी का पता शुरुआती चरणों में ही लगाया जा सकेगा।
WT-1 बायोमार्कर और ELISA किट: जांच होगी आसान
प्रतिकुलपति प्रो. सुधीर के. अवस्थी एवं डॉ. अनुराधा कलानी के मार्गदर्शन में हुए इस शोध में WT-1 को यूरिन-आधारित बायोमार्कर के रूप में पहचाना गया है। इसके आधार पर एक ELISA डायग्नोस्टिक किट तैयार की गई है। जिससे यह जांच आसानी से की जा सकेगी।
क्यों खास है यह शोध? > आमतौर पर डायबिटिक नेफ्रोपैथी का पता तब चलता है जब किडनी काफी हद तक क्षतिग्रस्त हो चुकी होती है। यह नई किट रोग की प्रगति को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ लेगी, जिससे समय रहते इलाज संभव होगा और स्वास्थ्य पर होने वाला भारी खर्च भी कम होगा।
दूध के एक्सोसोम और हल्दी का मेल: अनोखा उपचारशोध में केवल बीमारी की पहचान ही नहीं, बल्कि उपचार पर भी काम किया गया है। शताक्षी ने दूध से प्राप्त एक्सोसोम्स के भीतर हल्दी के मुख्य तत्व ‘करक्यूमिन’ को एन्कैप्सुलेट (Encapsulate) किया।परिणाम: इससे करक्यूमिन की शरीर में घुलने की क्षमता (Bioavailability) बढ़ गई।
प्रभाव: यह नैनो-डिलीवरी सिस्टम किडनी में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को कम करने में अत्यधिक प्रभावी पाया गया।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था (ESG) पर जोर
शताक्षी चतुर्वेदी ने इस शोध को भारत की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से जोड़ते हुए ESG (Environmental, Social, and Governance) शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने अपने इस सफर में विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग और R&D सेल के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।






