G-INews, KANPUR । भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर की जैव विज्ञान एवं जैव इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर बुशरा अतीक को प्रतिष्ठित 33वें घनश्याम दास बिड़ला (GD Birla) पुरस्कार के लिए चुना गया है। उन्हें यह सम्मान प्रोस्टेट और कोलोरेक्टल कैंसर के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व शोध और उपचार की नई दिशाएं खोजने के लिए दिया जा रहा है।
प्रो. बुशरा अतीक यह सम्मान पाने वाली IIT कानपुर की तीसरी वैज्ञानिक हैं। उनसे पहले संस्थान के निदेशक प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रो. संजय मित्तल को यह पुरस्कार मिल चुका है।
शोध की मुख्य विशेषताएं: कैंसर मरीजों के लिए नई उम्मीदप्रो. अतीक का शोध बायोमेडिकल अनुसंधान और नैदानिक (Clinical) रणनीतियों पर केंद्रित है। उनके कार्यों ने कैंसर के इलाज को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की है:
प्रोस्टेट कैंसर का नया इलाज: उन्होंने खोजा कि कुछ सामान्य एंटी-एंड्रोजन दवाएं प्रोस्टेट कैंसर के उन्नत चरणों यानी गंभीर मरीजों के उपचार में हानिकारक हो सकती हैं। इसके विकल्प के रूप में उन्होंने केसिन किनेज-1 अवरोधकों को एक प्रभावी सहायक उपचार के रूप में पहचाना। इससे लाखों करोड़ों लोगों को लाभ हुआ

मलेरिया की दवा का कैंसर में प्रयोग: प्रो. बुशरा की टीम ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा स्वीकृत मलेरिया रोधी दवा आर्टेमिसिनिन का उपयोग प्रतिरोधी कैंसर की संवेदनशीलता बहाल करने के लिए किया।
प्रारंभिक पहचान के नए टूल्स: कोलोरेक्टल कैंसर के लिए उन्होंने प्लाज्मा-आधारित बायोमार्कर (स्फिंगोलिपिड्स) की पहचान की है, जो बिना किसी बड़ी सर्जरी या जांच के प्रारंभिक अवस्था में बीमारी का पता लगा सकते हैं।
प्रिसीजन मेडिसिन: उनके शोध ने भविष्य में ‘प्रिसीजन मेडिसिन’ यानी रोगी की जेनेटिक संरचना के आधार पर सटीक इलाज का मार्ग प्रशस्त किया है।शैक्षणिक सफर और सम्मानप्रो. बुशरा का शैक्षणिक सफर बरेली से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा है:
शिक्षा: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से ग्रेजुएशन, पोस्ट-ग्रेजुएशन और पीएचडी।अनुभव: एम्स (AIIMS) दिल्ली और मैकगिल विश्वविद्यालय (कनाडा) में शोध के बाद अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी में रिसर्च इन्वेस्टिगेटर रहीं।पुरस्कार: इससे पहले उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, यूनेस्को-टवास पुरस्कार, जेसी बोस फेलोशिप और टाटा इनोवेशन फेलोशिप जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं।”
सफलता का श्रेय टीम और संस्थान को”अपनी इस उपलब्धि पर प्रो. बुशरा अतीक ने विनम्रता व्यक्त करते हुए कहा कि इस सफलता में उनके छात्रों के कठिन परिश्रम और IIT कानपुर के बेहतरीन शोध वातावरण का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने बताया कि उनकी टीम का लक्ष्य ऐसी तकनीकों का विकास करना है जो आम मरीजों के लिए सस्ती और सुलभ हों।”
हमारा शोध न केवल कैंसर के जीव विज्ञान को समझने में मदद करता है, बल्कि यह नैदानिक परीक्षणों के जरिए मरीजों को बेहतर जीवन देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।” — प्रो. बुशरा अतीक
प्रो. बुशरा अतीक के शोध की दो सबसे महत्वपूर्ण बातें—मलेरिया की दवा का कैंसर में उपयोग और बायोमार्कर—को सरल भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. आर्टेमिसिनिन (मलेरिया की दवा) कैंसर में कैसे काम करती है?
आमतौर पर जब कैंसर पुराना हो जाता है, तो उस पर कीमोथेरेपी या अन्य दवाओं का असर होना बंद हो जाता है। इसे ‘ड्रग रेजिस्टेंस’ (दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता) कहते हैं।
- खोज: प्रो. बुशरा ने पाया कि आर्टेमिसिनिन (Artemisinin), जो दशकों से मलेरिया के इलाज में सुरक्षित रूप से इस्तेमाल हो रही है, कैंसर कोशिकाओं की इस “जिद्दी” दीवार को तोड़ सकती है।
- असर: यह दवा कैंसर कोशिकाओं को फिर से ‘संवेदनशील’ बना देती है ताकि कैंसर की मुख्य दवाएं उन पर दोबारा असर कर सकें।
- फायदा: चूंकि यह दवा पहले से ही बाजार में उपलब्ध और सुरक्षित है, इसलिए कैंसर के इलाज में इसके इस्तेमाल से नई दवाओं के विकास में लगने वाला समय और खर्च दोनों बच जाते हैं।

2. बायोमार्कर: कैंसर की पहचान अब और आसान
कैंसर की पहचान के लिए अक्सर दर्दनाक बायोप्सी (शरीर का टुकड़ा निकालना) करनी पड़ती है। प्रो. बुशरा की टीम ने कोलोरेक्टल कैंसर (आंत का कैंसर) के लिए प्लाज्मा-आधारित बायोमार्कर खोजे हैं।
- क्या है बायोमार्कर: ये शरीर में खून या प्लाज्मा के अंदर मौजूद खास किस्म के लिपिड्स (वसा के अणु) होते हैं।
- कैसे काम करता है: प्रो. बुशरा ने जटिल स्फिंगोलिपिड्स (Sphingolipids) की पहचान की है। अगर किसी व्यक्ति के खून में इनका स्तर बदला हुआ है, तो यह संकेत देता है कि व्यक्ति को कैंसर हो सकता है।
- फायदा: यह एक ‘नॉन-इनवेसिव’ तकनीक है, यानी सिर्फ खून की जांच से ही शुरुआती स्तर पर कैंसर का पता लगाया जा सकता है, जिससे मरीज के बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
3. प्रिसीजन मेडिसिन (Precision Medicine) क्या है?
इसे आप ‘सटीक इलाज’ कह सकते हैं। पहले कैंसर का एक ही इलाज हर मरीज पर आजमाया जाता था। लेकिन प्रो. बुशरा का शोध यह बताता है कि:
- हर मरीज के कैंसर का जेनेटिक मेकअप (DNA संरचना) अलग होता है।
- उनकी टीम ने SPINK1 जैसे खास प्रोटीन्स की पहचान की है।
- इससे डॉक्टरों को यह पता चल सकेगा कि किस मरीज को कौन सी दवा असर करेगी और किसे नहीं, जिससे मरीज का समय और पैसा गलत इलाज में बर्बाद नहीं होगा।






